स्पष्ट एक्सप्रेस 01 जून 2026

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खबर 01

बापूग्राम प्रकरण: जमीन के एक टुकड़े के विवाद छीनी लोगों की नींद

स्पष्ट एक्सप्रेस। 
आईडीपीएल ऋषिकेश, 31 मई 2026: सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश से ऋषिकेश के आधे शहर की नींद उड़ी हुई है। यह आदेश 2866 एकड़ वन भूमि को खाली कराने से संबंधित है। इस भूमि पर एम्स सहित बापूग्राम, अमित ग्राम, शिवाजी नगर, मीरा नगर और आईडीपीएल जैसे मोहल्ले बसे हैं। नगर निगम के इन इलाकों में करीब 75 हजार लोग रहते हैं, जिनमें कई परिवार चार पीढ़ियों से निवास कर रहे हैं।
          यह विवाद 30 बीघा जमीन के एक छोटे से टुकड़े को लेकर दो लोगों के बीच शुरू हुआ था। मामला निचले कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक चला, वहां से एक के पक्ष में फैसला हुआ तो दूसरा पक्ष बेदखली के डर से सुप्रीम कोर्ट चला गया। वहां तर्क दिया गया कि जमीन दूसरे पक्ष की नहीं वन विभाग की है। सुप्रीम कोर्ट ने नक्शे देखे और पूरे 2866 एकड़ जमीन को वनभूमि मानते हुए खाली कराने का आदेश दे दिया। जनवरी 2026 में प्रशासन बुलडोजर लेकर कब्जा हटवाने पहुंचा। लोगों ने भारी विरोध किया। पथराव और लाठीचार्ज के बाद आखिरकार प्रशासन को पीछे हटना पड़ा। अब अन्य लोग भी बापूग्राम बचाओ संघर्ष समिति के बैनर तले सुप्रीम कोर्ट गए हैं। उनका तर्क है कि 70 साल से रह रहे लोगों को हटाना मानवाधिकारों का हनन है। इस मामले की अगली सुनवाई 15 जुलाई को होगी। सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि आवासीय इलाकों को बचाया जाए या पूरी जमीन को वन क्षेत्र माना जाए।
         विवादित जमीन का संबंध महात्मा गांधी की शिष्या मीरा बेन से है। 1948 में तत्कालीन यूपी सरकार ने मीरा बेन को 2866 एकड़ वन भूमि लीज पर दी थी। यह भूमि पशुओं की सेवा और खेती के लिए ऋषिकेश के वीरभद्र ब्लॉक में पशुलोक सोसाइटी के नाम पर थी। मीरा बेन ने यहां बापूग्राम बनाकर निराश्रितों और स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों को बसाया।
          1982 में मीरा बेन की मृत्यु हो गई। 1984 में पशुलोक सोसाइटी ने जमीन वन विभाग को सौंप दी। हालांकि, वहां बसे लोग नहीं हटे। टिहरी बांध विस्थापितों समेत अन्य लोग भी बसते चले गए। उन्हें बिजली, पानी और राशन कार्ड भी जारी किए गए। यह जमीन आज भी वन विभाग के रिकॉर्ड में रिजर्व फॉरेस्ट के रूप में दर्ज है। अब आते हैं विवाद पर। टेकचंद्र शर्मा के पिता को मीरा बेन से 30 बीघा जमीन मिली थी। टेकचंद्र ने इसे अपनी पुश्तैनी जायदाद बताया, जिस पर अनीता कंडवाल व अन्य 24-25 परिवारों के घर थे। टेकचंद्र ने बेदखली का मुकदमा किया और 2015 में निचली अदालत ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया। डरे परिवार स्टे लेने के लिए हाईकोर्ट तक गए लेकिन सभी जगह याचिकाएं खारिज हो गईं। जिस पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अनीता कंडवाल ने तर्क दिया कि जमीन वन विभाग की है, टेकचंद्र की नहीं।
          सुप्रीम कोर्ट ने इसे गंभीरता से लिया। सीजेआई सूर्यकांत की पीठ ने नक्शे देखे और पाया कि ऋषिकेश में हजारों एकड़ वन भूमि पर कंक्रीट का जंगल खड़ा हो गया है। इसके बाद कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए उत्तराखंड के मुख्य सचिव और प्रधान मुख्य वन संरक्षक को 2866 एकड़ भूमि अतिक्रमण मुक्त कराने का आदेश दिया। साथ ही खरीद-फरोख्त और नए निर्माण पर रोक लगा दी। कोर्ट ने इसे दशकों की निष्क्रियता, अवैध कब्जा करने वालों, राजनेताओं और नौकरशाहों के बीच गहरी मिलीभगत का परिणाम बताया। मुख्य सचिव को अतिक्रमण की जांच और भूमि हड़पने में शामिल अधिकारियों की पहचान के लिए समिति गठित करने के निर्देश दिए गए।
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